शुक्रवार, 6 जनवरी 2012

"YES!+ के पांच सूत्र "

YES !+ वर्कशॉप ज्ञान ,ध्यान व मस्ती  से परिपूर्ण होता है.
अतः Winter  Break Upgrade  के दिन आश्रम में कुछ ऐसी जरूरत पड़ी कि मुझे इस कविता की रचना का सौभाग्य प्राप्त हुआ.
Upgrade में समय की कितनी पावंदी होती है इससे तो आप परिचित हैं ही.

अतः दिल और दिमाग की मिश्रित अभिव्यक्ति आपके समक्ष प्रस्तुत है......

"बिन रात के दिन कहाँ,
 सिक्के के दो पहलु की तरह ,
 छाया हरदम होती है वहां,
 रौशनी रहती है जहाँ |

दुनिया में है ये सबसे बड़ा रोग
क्या कहेंगे लोग ,क्या कहेंगे लोग|

भूत गया बीत,
भविष्य का हर वक्त क्यों गाते तुम गीत ,
अगर जीतना है दुनिया को,
वर्तमान को जीत,वर्तमान को जीत|

हम  हैं  मानव ,गिर  गिर  कर  उठते  हैं ,
गलतियों  से सीखते  हैं ,दुनियां  को जीतते  हैं
जब  हमें  यह  है पता ,
हम हमेशा औरों की गलतियाँ में कारण क्यों ढूंढते हैं|

हम  हैं  मानव  भाई  भाई ,
क्यों करते रहते किसी की कमियों की बुराई,
परिश्थितियों  को गले  लगाएं, 
जीवन  की जंग  जीत  जाएँ |"

                                         -----जय गुरुदेव ||

सोमवार, 14 नवंबर 2011

नयनों का संसार

क्षमा प्रार्थी हूँ  जो इतने क्लिष्ट शब्दों का प्रयोग किया,पर नयनों की भाषा इतनी जटिल है की सीधे शब्दों में पंक्तिबद्ध नहीं होती.यह कविता उस मंजर को दर्शाती है जब प्रेमी अपनी प्रेमिका की आँखों में डूबता जाता है.फिर आँखों से जो भाषा कुछ कहती प्रतीत होती है उसका वर्णन इस प्रकार है......

मौन की अद्वितीय भाषा में,
अपूर्णता  नहीं,क्षुद्रता  नहीं,
विचित्र नयनो की अभिलाषा में ,
अपंगता नहीं ,अक्षमता नहीं

मौन की शक्ति समाहित द्वोर्जा में
प्राकृत  प्रकट,पर कोई चंचलता नहीं
पूरा विश्व अवतरित द्विनेत्रों  में
न ही सीमित ,अविनीत नहीं

दया,प्रेम,करुणा,त्याग इस संसार में
 ईर्ष्या नहीं,धृष्टता नहीं
प्रतीत होते हैं एक आग्रह में
सह सकती नहीं अवहेलना,बेवफाई नहीं

विदित होता है टेसुओं से
विक्षोह नहीं,बस एकता है ,पर प्रतिभूति नहीं
सम्मोहित हूँ मैं ,डूबता रहा हूँ अथाह सागर में
बचने की कोई गुंजाइश नहीं,और ख्वाहिश भी नहीं|

भावार्थ इस प्रकार है......
प्रथम पद्यांश (आँखों  की भाषा मौन है.इसमें खो जाने पर किसी वस्तु  की ख्वाहिश नहीं रह जाती.हृदय पूर्ण व तृप्त हो जाता है.दो नयनों की जो चाह है वह पूर्ण स्पष्ट है व इन्हें विश्वास है कि ये जो चाहती  है वह पा ही लेंगी.)
द्वितीय पद्यांश (मौन में जो शक्ति है वह इन दोनों ऊर्जा रुपी आखों में समाहित हो गयी हैं. पर यह ऊर्जा दिशाहीन नहीं,बिलकुल अविचल है.दोनों नेत्रों में पूरा विश्व जो विशाल है दीखता है पर इसमें कोई अभिमान नहीं दृष्टता.)
तृतीय पद्यांश (जितने भी स्त्रियोचित गुण हैं सभी इन आखों में साफ़ साफ़ दीखते हैं पर इनमे ईर्ष्या-द्वेष नहीं दिख रही न ही कोई चालाकी,बिलकुल नवजात शिशु के आखों की तरह.ये सामने की दो आँखों से यह आग्रह कर रही हैं कि कुछ भी हो हमें अपने दिल से ज़रा भी दूर न  करना और न ही इन आँखों को सौत के दर्शन कराना व बिलकुल मेरी तरह दिल साफ़ रखना )
चतुर्थ पद्यांश (आँखों से लुढ़कते अश्क ने गुस्से को अपने में घोलकर आँखों को बरी कर दिया है जिसके फलस्वरूप  दोनों आँखें सामने की दो आँखों में एकाकार हो गयी हैं.मैं इन दो सागर जैसे आखों में डुबकियाँ लगाता  रहा हूँ जिनमे डूबने से मुझे कोई बचा नहीं सकता और न ही मैं प्रयास करूँगा बचने का)

शुक्रवार, 23 सितंबर 2011

उन्मुक्त यादें

नील गगन में,झूम पवन में
उड़ता हूँ मैं वन उपवन में
मन करता है उड़ जाऊं मैं
पर खोल उन्मुक्त बचपन में

बेहद रसीले ,पीले पीले
आमों के उन ऋतु सावन में
कर आऊं मैं सैर बाग़ कि
इस मंजर मैं ,उन मंजर में


छा जाऊं बन राग - रागिनी
चंचल मृग के चित नयनन में
कर आऊं मैं सैर बाग की
इस मंजर मैं ,उन मंजर में

गंगा कि मटमैली रेती
धारा जिसकी नाव थी खेती
डूब के सागर में भाव की
कर आऊं मैं सैर नाव की

बुधवार, 31 अगस्त 2011

समय समय की बात

ऐसा क्यों होता है 
एक पल को  लगता है सब अपने हैं 
 काफी सामंजस्य है  मुझमे,तुझमे ,हम सब में 
जुड़े हैं एक ही तार से 
पर अगले ही क्षण महसूस होता है
अकेला हूँ मैं, बिलकुल अकेला
जो नजदीकी हैं,बयां न कर सकते उनसे भी 
व्यवहार फिर औपचारिक होता जाता है
तब मौन ही मेरी  भाषा है
मेरा सबसे अपना ,परम मित्र
करीबी भी तब दूर के रिश्तेदार लगते हैं
शून्य में जाती है नजर , शरीर निष्प्राण 
मौन की गूंजती संगीत , चुप्पी की वृद्धि करती 
इन्द्रियां सिमट जाती हैं, मन संलग्नता त्यागता है

फिर चंद विषय , गर्माते हैं
शिथिल हुए मन को 
ताकि फिर फ़ैल सके यह 
भाग सके यह विषय वृत्तियों के पीछे 
संलग्न हो फिर उन्ही मनभावनी  कृत्यों में

रविवार, 14 अगस्त 2011

" भोर "

  प्रथम बेर देखा , कल कारखानों की गर्जना शांत  है 
  पेड़ अंगडाई  ले  रहे हैं 
  मुर्गा भोर होने की टाह दे रहा है
  पशु पक्षी उत्सव मना रहे हैं
  एक नए सुबह के उपलक्ष्य  में 
  धूसरित आकाश में चाँद तारे टिमटिमा रहे हैं
  हुआ अंजोर 
  पक्षियों ,कीट पतंगों ,जानवरों ने 
  आज की यात्रा शुरू कर दी है,नए उल्लास के साथ 
  शायद  बीते  अतीत  को  भूलकर 
  सूरज की नवोदित मुस्कान
  प्रकृति के ख़ुशी में बाढ़ लाये जा रही है
  पर एक अजीब पशु देखा 
  जो अब तक इस कायनात से अज्ञ है
  जिसे नए विहान की तनिक भी परवाह नहीं 
  पर ख़ुशी है इस बात की कि अब जाकर 
  उसे सुकून की नींद नसीब हुई है
  प्रकृति व इसके अर्ह उपहारों से 
  भले ही उसका सामंजस्य न हो 
  अपने रोजमर्रा  के काम  से 
  बॉस  की डांट  से 
  बीबी  की बात से 
  उपाधी कारखानों से 
  पेशे की अस्थिरता से
  शाम को कर्योपरांत दैहिक थकान से
  चंद पलों के लिए सुकून तो है
  प्रकृति के अलंकारों को झाँकने का समय कहाँ 
  न ही  वक्त है खुद के अन्दर झाँकने का 
  जीवन पद्धति के बारे में सोंचने का
  दौड़ भाग तो पंछी ,कीट-पतंग और सूरज भी रहे हैं
  पर कल-कारखानों और आदमी की तरह नहीं 
  जिनमें कोई भाव नहीं
  जीवन के लिए 
  न ही जिज्ञासा 
  और न ही प्रकृति के लिए कोई सम्मान 

  दूर अब आवाज सुनाई दे रही है 
  मंदिर में बजते घंटों की
  थाप उठ रही है नाल और तबलों पर 
  सुनकर सुकून हुआ की चंद प्रहरी तो सजग हैं
  प्रकृति का  
  झूमते पेड़ों का 
  प्राणमयी बहती हवाओं का  
  उल्लास में उड़ते पंछियों का
  और जीवन में रस भरते 
  मुस्कुराते सूरज का
 और सबके निर्माता परमात्मा के स्तित्व का ||