बुधवार, 31 अगस्त 2011

समय समय की बात

ऐसा क्यों होता है 
एक पल को  लगता है सब अपने हैं 
 काफी सामंजस्य है  मुझमे,तुझमे ,हम सब में 
जुड़े हैं एक ही तार से 
पर अगले ही क्षण महसूस होता है
अकेला हूँ मैं, बिलकुल अकेला
जो नजदीकी हैं,बयां न कर सकते उनसे भी 
व्यवहार फिर औपचारिक होता जाता है
तब मौन ही मेरी  भाषा है
मेरा सबसे अपना ,परम मित्र
करीबी भी तब दूर के रिश्तेदार लगते हैं
शून्य में जाती है नजर , शरीर निष्प्राण 
मौन की गूंजती संगीत , चुप्पी की वृद्धि करती 
इन्द्रियां सिमट जाती हैं, मन संलग्नता त्यागता है

फिर चंद विषय , गर्माते हैं
शिथिल हुए मन को 
ताकि फिर फ़ैल सके यह 
भाग सके यह विषय वृत्तियों के पीछे 
संलग्न हो फिर उन्ही मनभावनी  कृत्यों में

रविवार, 14 अगस्त 2011

" भोर "

  प्रथम बेर देखा , कल कारखानों की गर्जना शांत  है 
  पेड़ अंगडाई  ले  रहे हैं 
  मुर्गा भोर होने की टाह दे रहा है
  पशु पक्षी उत्सव मना रहे हैं
  एक नए सुबह के उपलक्ष्य  में 
  धूसरित आकाश में चाँद तारे टिमटिमा रहे हैं
  हुआ अंजोर 
  पक्षियों ,कीट पतंगों ,जानवरों ने 
  आज की यात्रा शुरू कर दी है,नए उल्लास के साथ 
  शायद  बीते  अतीत  को  भूलकर 
  सूरज की नवोदित मुस्कान
  प्रकृति के ख़ुशी में बाढ़ लाये जा रही है
  पर एक अजीब पशु देखा 
  जो अब तक इस कायनात से अज्ञ है
  जिसे नए विहान की तनिक भी परवाह नहीं 
  पर ख़ुशी है इस बात की कि अब जाकर 
  उसे सुकून की नींद नसीब हुई है
  प्रकृति व इसके अर्ह उपहारों से 
  भले ही उसका सामंजस्य न हो 
  अपने रोजमर्रा  के काम  से 
  बॉस  की डांट  से 
  बीबी  की बात से 
  उपाधी कारखानों से 
  पेशे की अस्थिरता से
  शाम को कर्योपरांत दैहिक थकान से
  चंद पलों के लिए सुकून तो है
  प्रकृति के अलंकारों को झाँकने का समय कहाँ 
  न ही  वक्त है खुद के अन्दर झाँकने का 
  जीवन पद्धति के बारे में सोंचने का
  दौड़ भाग तो पंछी ,कीट-पतंग और सूरज भी रहे हैं
  पर कल-कारखानों और आदमी की तरह नहीं 
  जिनमें कोई भाव नहीं
  जीवन के लिए 
  न ही जिज्ञासा 
  और न ही प्रकृति के लिए कोई सम्मान 

  दूर अब आवाज सुनाई दे रही है 
  मंदिर में बजते घंटों की
  थाप उठ रही है नाल और तबलों पर 
  सुनकर सुकून हुआ की चंद प्रहरी तो सजग हैं
  प्रकृति का  
  झूमते पेड़ों का 
  प्राणमयी बहती हवाओं का  
  उल्लास में उड़ते पंछियों का
  और जीवन में रस भरते 
  मुस्कुराते सूरज का
 और सबके निर्माता परमात्मा के स्तित्व का ||

शनिवार, 16 जुलाई 2011

The Face of Fascination

A brother of mine
       So simple but who shines
       Years of eight
       But except laughing nothing is in his fate
       Neither can he speak two words of love and hate
       Nor can he walk or sit by his waist
       Seems he knows only love and cheer
       And something about the word so called 'fear'
       He laughs every time
       Except when he needs food
       Or when any disease grows up in that dude
       He neither knows mom nor his dad
       He only knew those who have him food
       And who shared their love and affection they had
       He is my 'BHOLA'
       Who preaches me to laugh in every situation
       A symbol of strength, the face of fascination....

रविवार, 5 जून 2011

" बूँद का महत्त्व "

उष्णता से तृप्तोपरांत त्रस्त
उत्सर्जित नमकीन बूँदोँ से पस्त
आस मेँ चंद सुकुन की
विश्वास मेँ बादलोँ से टपकते रस बूँद की

हलक सूखते थे,
पक्षियों के प्राण टूटते थे
छाँह में भी बेचैन थे हम
फिर भी आमों में बौर फूटते थे

काले बादलों को देख हर्षोल्लासित हुआ मन
बरसते बूँदोँ को आँखोँ के पलकोँ पे,
अधरोँ पे,चेहरे पे,
महसूसता था सूखा हलक और
बरसों बारिश में नहाने को अतृप्त मन

बङी - बङी बूँदेँ, चेहरे पे बिछ जाती
जैसे होँ मृत्यु-शय्या पे पङे,
हेतू एक पल और जीने को प्राण
जो पल मेँ ही दे गया,जीवन जीने को एक और विश्राम॥

रविवार, 17 अप्रैल 2011

आप इतना क्यों याद आते हैं?

शहर के साथ चेहरा और चेहरे के साथ लोग बदल जाते हैं
पर अपनों की तो छोड़ ,गैर भी खूब याद आते हैं
जीने को मुकम्मल होता है जो जहाँ
पर वहां सिर्फ पराये नजर आते हैं


मारी गई मति होती है,जब ऐसी गति होती है

सर टिकाने को कंधे ,आँखों में भरने को आँखें तरस जाती हैं 
महसूसता तो हूँ खूब,पर बाहों में कहाँ वे आते हैं
भूल कर भी जिन्हें हम भुला न पाते हैं,वे ही में बहुत सताते हैं|