बुधवार, 9 मई 2012
शनिवार, 18 फ़रवरी 2012
चुप चुप क्यों
आज सुबह जब जगा और नेट खोला तो कुछ शब्द दिमाग में कुलबुला रहे थे...मैं जानना चाह रहा था की ये क्या कहना चाहते हैं,इसलिए मैंने कलम पकड़ी और पन्ने पर हाथ अनायास ही चल पड़ा.दिमाग में पिछली रात के पूर्ण चन्द्र की छवि थी......
जो पंक्तियाँ कागज़ पे उगी वो इस प्रकार हैं..
"ईश्वर अपनी कृति दुहराता नहीं,
उसे पसंद है नित नए निर्माण
पर न जाने क्यों शशि आभा से प्रेरित
निर्माण किया उसने तेरा,भावनाएं भरी तुझमें
हरेक विधा दी तुझको,घटते बढ़ते चन्द्र पटल सदृश
आज आसमान खुशियाँ मना रहा है
एक एक तारा ख़ुशी से गा रहा है
कारण कि दो पख में बस एक ही बार
तेरा पूर्ण व सर्वोत्कृष्ट रूप दृग में बसा जा रहा है
था इस पल,इस दिन का इंतज़ार कई दिनों से
इंतज़ार में हूँ तेरे लौट आने का उतने ही दिनों से
विश्वास है फीकी न होगी मुख कांति
दर्शन होंगे पुनः ,पुनः न होगी कभी ऐसी अक्षुण शांति ||
जो पंक्तियाँ कागज़ पे उगी वो इस प्रकार हैं..
"ईश्वर अपनी कृति दुहराता नहीं,
उसे पसंद है नित नए निर्माण
पर न जाने क्यों शशि आभा से प्रेरित
निर्माण किया उसने तेरा,भावनाएं भरी तुझमें
हरेक विधा दी तुझको,घटते बढ़ते चन्द्र पटल सदृश
आज आसमान खुशियाँ मना रहा है
एक एक तारा ख़ुशी से गा रहा है
कारण कि दो पख में बस एक ही बार
तेरा पूर्ण व सर्वोत्कृष्ट रूप दृग में बसा जा रहा है
था इस पल,इस दिन का इंतज़ार कई दिनों से
इंतज़ार में हूँ तेरे लौट आने का उतने ही दिनों से
विश्वास है फीकी न होगी मुख कांति
दर्शन होंगे पुनः ,पुनः न होगी कभी ऐसी अक्षुण शांति ||
माँ
माँ ईश्वर का दिया एक अमूल्य उपहार है ।महत्व तब समझ आता है जब........सब कुछ मिल जाता है लेकिन हाँ "माँ नहीं मिलती"।
माँ तुमने जो राह बतायी उसी पर चला करता हूँ
तब और अब में फर्क इतना है
तब सीखने के लिए समय न मिलता था
अब तुम्हारे लिए समय नहीं है
तब चंद पल आपसे दूर रहना मुश्किल था
अब चंद पल आप के साथ बिताने का समय कहाँ
तब तेरी गोद से अलग बिछौना न था
अब तेरी गोद का बिछौना ही नहीं यहाँ
तब स्वाद था,खाने का नही ,तुम्हारी उंगलियों से बरसते स्नेह का
अब न स्वाद है खाने में ,
तेरी उंगलियों से लिपटे खाने का नसीब कहाँ
तब तुम्हारी डांट बड़ी बुरी लगती थी
अब खुद को डाँटना भी भूल गया ,आपकी डांट कहाँ जो बुरी भी लगे
तब उत्तेजना दर्शाने को तुमसे आलिंगन ही काफी था
अब उत्तेजना आपकी यादों के पीछे दब कर रह जाती है
तब मेरे पलकों से चले आँसू पूरे कपोल का सफर भी तय न कर पाते थे
पहले झाँकते थे आँखों से ,ढूँढते थे तुम्हें
तेरे हाथो का स्पर्श पा सारा दुख भूल जाते थे
अब न वो स्पर्श है ,न ही झांकना पसंद है अब इन्हें
तुम्हारे इंतज़ार में सदियों बिताये इन्होने
जाने इस दरम्यान कैसे कैसे थपेड़े खाये इन्होने
अब फोन पर तेरे आवाज का आलिंगन कर
बरसने की इजाजत माँगा करती हैं मुझसे
तब सर्दी -गर्मी का भान कहाँ होता था नींद में
तुमसे लिपटकर जैसे हर मौसम बसंत था
अब नींद भी छोड़ जाती है मुझे,प्यार से बुलाता हूँ
गले लगाने को मुझमे समाने को
मुह फुलाए आती है, दुम दबाये भाग जाती है
पता नहीं इसे मुझसे शिकायत है या तुमसे।
शुक्रवार, 6 जनवरी 2012
"YES!+ के पांच सूत्र "
YES !+ वर्कशॉप ज्ञान ,ध्यान व मस्ती से परिपूर्ण होता है.
अतः Winter Break Upgrade के दिन आश्रम में कुछ ऐसी जरूरत आ पड़ी कि मुझे इस कविता की रचना का सौभाग्य प्राप्त हुआ.
Upgrade में समय की कितनी पावंदी होती है इससे तो आप परिचित हैं ही.
अतः दिल और दिमाग की मिश्रित अभिव्यक्ति आपके समक्ष प्रस्तुत है......
"बिन रात के दिन कहाँ,
सिक्के के दो पहलु की तरह ,
छाया हरदम होती है वहां,
रौशनी रहती है जहाँ |
दुनिया में है ये सबसे बड़ा रोग
क्या कहेंगे लोग ,क्या कहेंगे लोग|
भूत गया बीत,
भविष्य का हर वक्त क्यों गाते तुम गीत ,
अगर जीतना है दुनिया को,
वर्तमान को जीत,वर्तमान को जीत|
हम हैं मानव ,गिर गिर कर उठते हैं ,
गलतियों से सीखते हैं ,दुनियां को जीतते हैं
जब हमें यह है पता ,
हम हमेशा औरों की गलतियाँ में कारण क्यों ढूंढते हैं|
हम हैं मानव भाई भाई ,
क्यों करते रहते किसी की कमियों की बुराई,
परिश्थितियों को गले लगाएं,
जीवन की जंग जीत जाएँ |"
-----जय गुरुदेव ||
अतः Winter Break Upgrade के दिन आश्रम में कुछ ऐसी जरूरत आ पड़ी कि मुझे इस कविता की रचना का सौभाग्य प्राप्त हुआ.
Upgrade में समय की कितनी पावंदी होती है इससे तो आप परिचित हैं ही.
अतः दिल और दिमाग की मिश्रित अभिव्यक्ति आपके समक्ष प्रस्तुत है......
"बिन रात के दिन कहाँ,
सिक्के के दो पहलु की तरह ,
छाया हरदम होती है वहां,
रौशनी रहती है जहाँ |
दुनिया में है ये सबसे बड़ा रोग
क्या कहेंगे लोग ,क्या कहेंगे लोग|
भूत गया बीत,
भविष्य का हर वक्त क्यों गाते तुम गीत ,
अगर जीतना है दुनिया को,
वर्तमान को जीत,वर्तमान को जीत|
हम हैं मानव ,गिर गिर कर उठते हैं ,
गलतियों से सीखते हैं ,दुनियां को जीतते हैं
जब हमें यह है पता ,
हम हमेशा औरों की गलतियाँ में कारण क्यों ढूंढते हैं|
हम हैं मानव भाई भाई ,
क्यों करते रहते किसी की कमियों की बुराई,
परिश्थितियों को गले लगाएं,
जीवन की जंग जीत जाएँ |"
-----जय गुरुदेव ||
सोमवार, 14 नवंबर 2011
नयनों का संसार
मौन की अद्वितीय भाषा में,
अपूर्णता नहीं,क्षुद्रता नहीं,
विचित्र नयनो की अभिलाषा में ,
अपंगता नहीं ,अक्षमता नहीं
मौन की शक्ति समाहित द्वोर्जा में
प्राकृत प्रकट,पर कोई चंचलता नहीं
पूरा विश्व अवतरित द्विनेत्रों में
न ही सीमित ,अविनीत नहीं
दया,प्रेम,करुणा,त्याग इस संसार में
ईर्ष्या नहीं,धृष्टता नहीं
प्रतीत होते हैं एक आग्रह में
सह सकती नहीं अवहेलना,बेवफाई नहीं
विदित होता है टेसुओं से
विक्षोह नहीं,बस एकता है ,पर प्रतिभूति नहीं
सम्मोहित हूँ मैं ,डूबता रहा हूँ अथाह सागर में
बचने की कोई गुंजाइश नहीं,और ख्वाहिश भी नहीं|
भावार्थ इस प्रकार है......
प्रथम पद्यांश (आँखों की भाषा मौन है.इसमें खो जाने पर किसी वस्तु की ख्वाहिश नहीं रह जाती.हृदय पूर्ण व तृप्त हो जाता है.दो नयनों की जो चाह है वह पूर्ण स्पष्ट है व इन्हें विश्वास है कि ये जो चाहती है वह पा ही लेंगी.)
द्वितीय पद्यांश (मौन में जो शक्ति है वह इन दोनों ऊर्जा रुपी आखों में समाहित हो गयी हैं. पर यह ऊर्जा दिशाहीन नहीं,बिलकुल अविचल है.दोनों नेत्रों में पूरा विश्व जो विशाल है दीखता है पर इसमें कोई अभिमान नहीं दृष्टता.)
तृतीय पद्यांश (जितने भी स्त्रियोचित गुण हैं सभी इन आखों में साफ़ साफ़ दीखते हैं पर इनमे ईर्ष्या-द्वेष नहीं दिख रही न ही कोई चालाकी,बिलकुल नवजात शिशु के आखों की तरह.ये सामने की दो आँखों से यह आग्रह कर रही हैं कि कुछ भी हो हमें अपने दिल से ज़रा भी दूर न करना और न ही इन आँखों को सौत के दर्शन कराना व बिलकुल मेरी तरह दिल साफ़ रखना )
चतुर्थ पद्यांश (आँखों से लुढ़कते अश्क ने गुस्से को अपने में घोलकर आँखों को बरी कर दिया है जिसके फलस्वरूप दोनों आँखें सामने की दो आँखों में एकाकार हो गयी हैं.मैं इन दो सागर जैसे आखों में डुबकियाँ लगाता रहा हूँ जिनमे डूबने से मुझे कोई बचा नहीं सकता और न ही मैं प्रयास करूँगा बचने का)
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